Shani Temple Indore

जूनि इंदौर शनि मंदिर: 300 साल पुरानी चमत्कारी कथा और इतिहास

जूनि इंदौर के प्राचीन शनि मंदिर की 300 साल पुरानी चमत्कारी कथा जानें, जहां शनिदेव स्वयं प्रकट हुए थे और अंधे पंडित को दृष्टि मिली।

इंदौर – अहिल्या की नगरी और प्राचीन शनि मंदिर

इंदौर शहर को अहिल्या की नगरी कहा जाता है। इसी पवित्र नगरी इंदौर के जूनि इंदौर क्षेत्र में एक प्राचीन शनि मंदिर स्थित है, जो अपनी चमत्कारी कथा और आस्था के लिए प्रसिद्ध है।

शनि मंदिर की प्रचलित चमत्कारी कथा

इस मंदिर से जुड़ी एक कथा बहुत ही प्रचलित है। माना जाता है कि लगभग 300 साल पहले यहां शनिदेव स्वयं प्रकट हुए थे। उन्होंने एक अंधे पंडित को दर्शन दिए और उनकी आंखों की रोशनी वापस लौटा दी। यह कथा सुनने में भले ही विचित्र लगे, लेकिन यहां के लोगों की गहरी आस्था इसे सत्य मानती है।

इसी कारण इंदौर का यह शनि मंदिर प्राचीन और चमत्कारिक माना जाता है।

300 साल पुराना इतिहास और पंडित गोपालदास तिवारी की कथा

कहा जाता है कि करीब 300 वर्ष पूर्व यहां एक 20 फुट ऊंचा टीला था। इसी स्थान पर वर्तमान पुजारी के पूर्वज पंडित गोपालदास तिवारी आकर ठहरे थे, जो दृष्टिहीन थे।

एक दिन शनिदेव उनके सपने में आए और कहा कि इस टीले के नीचे उनकी प्रतिमा है, उसे बाहर निकालो। पंडितजी ने कहा कि वे अंधे हैं, तब शनिदेव ने उन्हें आंखें खोलने को कहा। जैसे ही उन्होंने आंखें खोलीं, उनकी दृष्टि वापस आ गई।

इसके बाद पंडित गोपालदास जी ने टीले की खुदाई शुरू की। जब लोगों को इस चमत्कार के बारे में पता चला, तो उन्होंने भी खुदाई में मदद की। अंततः वहां से शनिदेव की प्रतिमा प्राप्त हुई, जिसे विधि-विधान से स्थापित किया गया।

आज वही प्रतिमा इस मंदिर में स्थापित है और इसे स्वयंभू माना जाता है।

भक्तों की आस्था और शनिवार का महत्व

शनिदेव के इस मंदिर में भक्तों की गहरी आस्था है। हर शनिवार यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

इंदौर ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के इलाकों से भी भक्त यहां शनिदेव को मत्था टेकने पहुंचते हैं। यह मान्यता है कि यहां स्थापित शनिदेव की प्रतिमा स्वयं प्रकट हुई है और इसे किसी ने बनाया नहीं है।

शनि जयंती पर होता है भव्य उत्सव

जूनि इंदौर के इस शनि मंदिर में हर वर्ष शनि जयंती बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है। इस अवसर पर देश के प्रसिद्ध कलाकार अपनी प्रस्तुति देकर शनिदेव के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं।

इनमें पंडित भीमसेन जोशी, अहमद हुसैन–मोहम्मद हुसैन, पंडित विश्वमोहन भट्ट, राधिका उमड़ेकर, रघुनाथ फड़के और डॉ. प्रभा अत्रे जैसे कलाकारों के नाम प्रमुख हैं।

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